
क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया में इतनी असमानता क्यों है? एक इंसान चांदी का चम्मच लेकर पैदा होता है, तो दूसरा दाने-दाने को मोहताज है। कोई सिगरेट पीकर भी 90 साल जीता है, तो कोई पूरी तरह स्वस्थ होकर भी कम उम्र में किसी बीमारी का शिकार हो जाता है।
जब हमारे साथ कुछ बुरा होता है, तो मन में सबसे पहला सवाल यही आता है—“मेरे साथ ही ऐसा क्यों?” मैंने तो किसी का बुरा नहीं किया।
अध्यात्म और भारतीय दर्शन (Indian Philosophy) के अनुसार, इसका जवाब ‘कर्म के सिद्धांत’ (Law of Karma) में छिपा है। आज के इस आर्टिकल के पहले भाग में, हम समझेंगे कि क्या वाकई हमारे वर्तमान दुख हमारे पिछले जन्मों की ‘उधारी’ हैं?
कर्म का ‘बही-खाता’ (The Karmic Account)
इसे एक बैंक अकाउंट की तरह समझिए। हमारा जीवन एक बही-खाता (Ledger) है। हिन्दू दर्शन के अनुसार, आत्मा अमर है और वह शरीर बदलती है। जब हम शरीर छोड़ते हैं, तो अपनी दौलत और शोहरत यहीं छोड़ जाते हैं, लेकिन एक चीज हमारे साथ जाती है—हमारे कर्मों का बैलेंस (Sanchita Karma)।
- क्रियामाण कर्म (Current Actions): जो हम अभी कर रहे हैं।
- संचित कर्म (Accumulated Actions): हमारे कई जन्मों के कर्मों का गोदाम।
- प्रारब्ध कर्म (Destiny): संचित कर्मों का वह छोटा सा हिस्सा जो हमें इस वर्तमान जीवन में भोगना है।
जब हमें बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के दुख मिलता है, तो उसे अक्सर ‘प्रारब्ध’ कहा जाता है। यह वो तीर है जो कमान से निकल चुका है और उसे वापस नहीं लिया जा सकता।
दुख: सजा है या सुधार?
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि भगवान उन्हें सजा दे रहा है। लेकिन कर्म का सिद्धांत ‘सजा’ (Punishment) पर नहीं, बल्कि ‘परिणाम’ (Consequence) पर आधारित है।
अगर पिछले जन्म में आपने किसी को धोखा दिया था, तो वह ऊर्जा (Energy) कहीं गायब नहीं हुई। वह एक ऋण (Debt) बनकर आपके अकाउंट में दर्ज हो गई। इस जन्म में जब वही धोखा आपको मिलता है, तो ब्रह्मांड बस उस हिसाब को बराबर (Balance) कर रहा होता है।
तो, क्या हमारे दुख पिछले जन्म से जुड़े हैं? हाँ, काफी हद तक। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि हम लाचार हैं? क्या हम सिर्फ कठपुतली हैं? इसका जवाब हम अगले भाग में जानेंगे।
(यह था समस्या का पहलू। लेकिन अगर सब कुछ पहले से तय है, तो कोशिश करने का क्या फायदा? क्या हम इस दुख को कम कर सकते हैं? इसके समाधान और ‘फ्री विल’ (Free Will) के बारे में जानने के लिए Part 2 पढ़ें।)
दुख से मुक्ति – क्या हम अपना भाग्य बदल सकते हैं?
प्रारब्ध बनाम पुरुषार्थ: कैसे काटें पिछले जन्मों के कर्मों का बंधन? (Part 2)
आर्टिकल के पहले भाग में हमने समझा कि कैसे हमारे पिछले जन्मों के ‘अनसुलझे हिसाब’ हमारे वर्तमान जीवन में सुख या दुख बनकर लौटते हैं। लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा सवाल उठता है—
“अगर मेरे दुख पिछले जन्म के कारण हैं और यह सब किस्मत में लिखा है, तो फिर मुझे मेहनत करने या अच्छा बनने की क्या जरूरत? जो होना है, वो तो होगा ही।”
यह सोच गलत है। कर्म का सिद्धांत हमें लाचार (Helpless) नहीं बनाता, बल्कि जिम्मेदार (Responsible) बनाता है। आइये जानते हैं कैसे।
तीर चुभेगा, पर घाव गहरा नहीं होगा
एक पुरानी कहावत है—“कर्म करने में इंसान स्वतंत्र है, लेकिन फल भोगने में परतंत्र।”
मान लीजिए, आपके पिछले कर्मों के अनुसार आपके पैर में चोट लगनी थी। यह ‘प्रारब्ध’ है, इसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन, यहाँ आपके वर्तमान कर्म (पुरुषार्थ) काम आते हैं:
- अगर आप अभी अच्छे कर्म करते हैं, सेवा करते हैं और सकारात्मक रहते हैं, तो हो सकता है कि वह बड़ी चोट सिर्फ एक ‘कांटा चुभने’ जितनी रह जाए।
- इसके विपरीत, अगर आप रोते रहते हैं और दूसरों को दोष देते हैं, तो वह छोटा सा घाव नासूर बन सकता है।
दुख आना पिछले कर्मों का फल हो सकता है, लेकिन उस दुख पर आप प्रतिक्रिया (React) कैसे करते हैं, यह आपके नए कर्म तय करता है। यही आपके अगले जन्म या भविष्य का निर्माण करेगा।
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दुख काटने के 3 प्रभावी तरीके (Spiritual Remedies)
हमारे शास्त्रों में कर्मों के बोझ को हल्का करने के उपाय भी बताए गए हैं:
- स्वीकार भाव (Acceptance): जब आप मान लेते हैं कि “यह मेरे ही किसी पुराने कर्म का भुगतान है”, तो मन से कड़वाहट खत्म हो जाती है। आप “भगवान ने मेरे साथ बुरा किया” सोचने की बजाय “चलो, एक कर्ज उतर गया” सोचने लगते हैं।
- सेवा और दान (Service): दूसरों का भला करना सबसे बड़ा ‘कर्म क्लींजर’ (Karma Cleanser) है। जब आप किसी और के दुख को कम करते हैं, तो कुदरत आपके दुख को कम करने के रास्ते खोल देती है।
- क्षमा (Forgiveness): अगर कोई आपको दुख दे रहा है, तो वह शायद अपना पुराना हिसाब बराबर कर रहा है। उसे माफ कर दें। अगर आप बदला लेंगे, तो यह चक्र (Cycle) कभी खत्म नहीं होगा और एक नया कर्म बन जाएगा।
निष्कर्ष (Conclusion):
तो, क्या हमारे दुख पिछले जन्मों से जुड़े हैं? हाँ। लेकिन क्या हमें उनके सामने हार मान लेनी चाहिए? बिल्कुल नहीं।
आपका अतीत (Past) आपके वर्तमान (Present) को प्रभावित कर सकता है, लेकिन उसे नियंत्रित नहीं कर सकता। आपकी आज की सोच और आज की मेहनत इतनी ताकतवर हो सकती है कि वह लकीरों को भी बदल दे।
दुख को एक ‘सजा’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘अवसर’ के रूप में देखें—खुद को मजबूत बनाने और पुराने कर्जों से मुक्त होने का अवसर।
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