
परिचय: दिल का वो सवाल जो हम सब पूछते हैं
“हे भगवान! जब आप अंतर्यामी हैं, सब जानते हैं, तो फिर मुझे ही दुख क्यों? मेरी ही परीक्षा क्यों?”
सच कहें तो, हम सभी ने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर आसमान की तरफ देखकर यह सवाल जरूर पूछा है। जब मुसीबतें चारों तरफ से घेर लेती हैं, तो यह सोचना स्वाभाविक है कि अगर ईश्वर हमारे ‘पिता’ समान हैं और वो जानते हैं कि हम कितने दर्द में हैं, तो वो खामोश क्यों हैं? क्या उन्हें हमारी तकलीफ नहीं दिखती?
आज इस आर्टिकल में हम इसी गहरे सवाल का जवाब ढूंढेंगे। यह जवाब किताबी नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव और आध्यात्मिक सत्य पर आधारित है।
1. परीक्षा ईश्वर के लिए नहीं, हमारे लिए होती है (Self-Realization)
सबसे पहली और बड़ी बात—ईश्वर हमारी परीक्षा इसलिए नहीं लेते कि उन्हें नहीं पता कि हम क्या कर सकते हैं। वो तो सब जानते हैं। परीक्षा इसलिए होती है ताकि ‘हम’ जान सकें कि हमारे भीतर कितनी ताकत है।
इसे एक उदाहरण से समझें: स्कूल में एक टीचर को पता होता है कि कौन सा बच्चा होशियार है। फिर भी वह ‘Exam’ लेता है। क्यों? ताकि वह बच्चा खुद अपनी योग्यता साबित कर सके और अगली कक्षा (Next Level) में जा सके।
मुसीबतें हमें यह बताने आती हैं कि हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं ज्यादा मजबूत हैं।
2. सोने को निखरने के लिए आग की जरूरत होती है (Purification)
क्या आपने कभी सुनार (Goldsmith) को सोना बनाते देखा है? सोना जितना ज्यादा आग में तपता है, उसकी चमक उतनी ही बढ़ती है और वह उतना ही शुद्ध होता है।
हमारे जीवन में आने वाले संघर्ष वही ‘आग’ हैं।
- यह हमारे अहंकार (Ego) को जलाते हैं।
- यह हमारे धैर्य (Patience) को बढ़ाते हैं।
- यह हमें विनम्र (Humble) बनाते हैं।
अगर भगवान हमें हमेशा सुख ही देंगे, तो हम शायद घमंडी और कमजोर हो जाएंगे। ईश्वर हमें तोड़ना नहीं चाहते, वो हमें तराशना (Polish) चाहते हैं, ताकि हम एक हीरा बन सकें।
3. विश्वास की असली पहचान संकट में ही होती है
जब सब कुछ अच्छा चल रहा हो, तब तो हर कोई कह सकता है—”भगवान बहुत अच्छे हैं, मैं भगवान को मानता हूँ।”
लेकिन असली भक्त या असली विश्वास वही है जो तब भी कायम रहे जब सब कुछ खिलाफ हो। ईश्वर यह देखना चाहते हैं कि आपका प्रेम उनसे है या सिर्फ उन सुविधाओं से जो उन्होंने आपको दी हैं?
“सुख में सुमिरन सब करे, दुख में करे न कोय” — कबीर दास जी का यह दोहा यही सिखाता है। दुख वो समय है जब ईश्वर हमारे सबसे करीब होते हैं, बस हमें महसूस करना होता है।
4. कर्मों का हिसाब-किताब (The Law of Karma)
कई बार जिसे हम ‘परीक्षा’ कहते हैं, वह असल में हमारे पुराने कर्मों का निपटारा (Cleansing) होता है। सनातन धर्म और आध्यात्म मानता है कि आत्मा की यात्रा बहुत लंबी है।
कभी-कभी भगवान हमारे जीवन में कठिन परिस्थितियां इसलिए भेजते हैं ताकि हमारे पुराने, बुरे कर्मों का हिसाब जल्दी खत्म हो जाए और हम आध्यात्मिक रूप से हल्के (Light) होकर आगे बढ़ सकें। यह सजा नहीं, बल्कि ‘शुद्धि’ की प्रक्रिया है।
5. हमें किसी बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार करना
इतिहास गवाह है—भगवान राम हों, पांडव हों या कोई महान व्यक्ति, सबका जीवन संघर्षों से भरा रहा।
जब भगवान किसी व्यक्ति से कोई बड़ा काम करवाना चाहते हैं, तो पहले उसे ठोक-बजाकर चेक करते हैं कि वह उस भार को उठाने लायक है या नहीं। अगर आज आप मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं, तो हो सकता है कि ईश्वर आपको भविष्य की किसी बड़ी जीत या जिम्मेदारी के लिए तैयार कर रहे हों।
Next – क्या हमारे दुख पिछले जन्म के कर्मों से जुड़े होते हैं?
निष्कर्ष: तो हमें क्या करना चाहिए?
दोस्तों, अगली बार जब जीवन में कोई परीक्षा आए, तो यह मत कहिए कि “भगवान, मैं ही क्यों?” (Why Me?) बल्कि मुस्कुराकर कहिए, “भगवान, तो आप मुझे आजमा रहे हैं? ठीक है, मैं इस परीक्षा में पास होकर दिखाऊंगा!” (Try Me!)
ईश्वर सब जानते हैं, इसीलिए वो कभी भी आपको उस मुसीबत में नहीं डालेंगे जिसे सहने की ताकत उन्होंने आपको न दी हो। उनकी परीक्षा में ही उनकी कृपा छिपी होती है।
क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा पल आया जब लगा कि भगवान कठिन परीक्षा ले रहे हैं, लेकिन बाद में सब अच्छा हुआ? अपने अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर शेयर करें। आपका एक कमेंट किसी निराश व्यक्ति को उम्मीद दे सकता है!

