
जब हम “ईश्वर” की कल्पना करते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में भव्य महलों, सोने के सिंहासनों और आसपास घिरी अनगिनत सेवकों की भीड़ की तस्वीर आती है। लेकिन महादेव? उनकी छवि इन सबसे बिल्कुल अलग है।
ज़रा सोचिए, वह “देवों के देव” हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं। अगर वे चाहते, तो सोने की लंका (जो उन्होंने खुद रावण को दे दी) या इंद्र की अमरावती से भी सुंदर महल में रह सकते थे। लेकिन उन्होंने क्या चुना? कैलाश।
बर्फ से ढका एक ऐसा निर्जन स्थान जहाँ जीवन का नामोनिशान मुश्किल से मिलता है। श्मशान की राख, गले में सांप और एकदम एकांत।
अक्सर मेरे और आपके मन में यह सवाल उठता है कि आखिर महादेव अकेले क्यों रहते हैं? क्या उन्हें अकेलापन पसंद है? या इसके पीछे कोई गहरा रहस्य है जो हमें जीवन जीने की कला सिखाता है?
आइए, इस एकांत के पीछे छिपे दर्शन को समझने की कोशिश करते हैं।
1. अकेलेपन और ‘एकांत’ का फर्क
सबसे पहले हमें एक बात समझनी होगी—महादेव ‘अकेले’ (Lonely) नहीं हैं, वे ‘एकांत’ (Solitude) में हैं। इन दोनों शब्दों में जमीन-आसमान का फर्क है।
- अकेलापन (Loneliness): यह एक कमजोरी है, जहाँ आपको किसी की कमी खलती है।
- एकांत (Solitude): यह एक ताकत है, जहाँ आप खुद के साथ पूर्ण महसूस करते हैं।
महादेव हमें सिखाते हैं कि खुशी बाहर की भीड़ में नहीं, बल्कि भीतर की शांति में है। जब वे ध्यान में लीन होते हैं, तो वे दुनिया से नहीं कटते, बल्कि वे अपने भीतर के ब्रह्मांड से जुड़ जाते हैं। उनका एकांत यह संदेश है कि “स्वयं को जानने के लिए शोर से दूर होना जरूरी है।”
2. वैराग्य का सर्वोच्च रूप
महादेव ‘आदि योगी’ हैं। एक योगी के लिए विलासिता और भीड़भाड़ बंधन समान होती है। कैलाश पर अकेले रहने का उनका निर्णय उनके ‘वैराग्य’ (Detachment) का प्रतीक है।
वे दुनिया के पालनहार होकर भी दुनिया की मोह-माया से निर्लिप्त हैं। श्मशान में उनका निवास यह याद दिलाता है कि अंत में सब कुछ राख होना है। जो व्यक्ति मृत्यु और एकांत को गले लगा सकता है, उसे जीवन का कोई भी दुख विचलित नहीं कर सकता। उनका अकेलापन यह उद्घोषणा है कि उन्हें खुश रहने के लिए किसी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं है—वे ‘आत्माराम’ हैं (जो अपनी ही आत्मा में रम गया हो)।
3. ‘शून्य’ ही सृजन का आधार है
विज्ञान भी मानता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति ‘शून्य’ या ‘Void’ से हुई है। शिव वही शून्य हैं। भीड़ में शोर होता है, लेकिन सन्नाटे में सृजन (Creation) होता है। जब एक बीज जमीन के अंधेरे और एकांत में गड़ा होता है, तभी वह पेड़ बनता है। महादेव का एकांत वह उपजाऊ भूमि है जहाँ से ज्ञान, योग और चेतना का जन्म होता है।
वे अकेले इसलिए रहते हैं ताकि वे उस परम शांति को बनाए रख सकें जो इस शोरगुल वाली दुनिया को संतुलित (Balance) करती है।
4. हमारे लिए एक सबक
आज के दौर में, हम अकेले होने से डरते हैं। हमें हर वक्त हाथ में मोबाइल या आसपास लोग चाहिए। हम खुद से भाग रहे हैं।
महादेव का जीवन हमें यह नहीं कहता कि हम सब घर-बार छोड़कर हिमालय चले जाएं। वे तो खुद ‘गृहस्थ’ भी हैं और ‘संन्यासी’ भी। वे माता पार्वती और अपने गणों के साथ भी रहते हैं, लेकिन मानसिक रूप से वे हमेशा उस एकांत में स्थिर रहते हैं।
वे हमें सिखाते हैं कि दिन भर में कुछ वक्त अपने लिए निकालना, शांत बैठना और खुद से बात करना कितना जरूरी है। यही वह समय है जब हम अपनी ऊर्जा को वापस पाते हैं।
निष्कर्ष: वह अकेले नहीं, वह ‘सब’ हैं
सच तो यह है कि जो कण-कण में बसा हो, वह अकेला कैसे हो सकता है? महादेव अकेले नहीं रहते, वे हर उस व्यक्ति के साथ हैं जो शांत होकर अपनी सांसों को महसूस करता है।
उनका कैलाश पर अकेले बैठना सिर्फ एक भौगोलिक स्थिति नहीं, बल्कि मन की एक अवस्था (State of Mind) है। एक ऐसी अवस्था जहाँ कोई शोर नहीं, कोई चिंता नहीं, सिर्फ अनंत शांति है।
तो अगली बार जब आप खुद को अकेला पाएं, तो घबराएं नहीं। याद रखें, महादेव भी अकेले रहते हैं—शायद यही वह वक्त है जब आप अपने भीतर के शिव से मिल सकते हैं।
हर हर महादेव!
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